पृष्ठ - 25 ,' दशद्वार से सोपान तक ' Harivansh Rai एक दिन महाभारत में मैंने पढ़ा , जो पूर्व की ओर मुंह कर के भोजन करता है उसे आयुष्य मिलता है ; जो पश्चिम की ओर , उसे लक्ष्मी मिलती है ; जो दक्षिण की ओर , उसे कीर्ति और ; और जो उत्तर की ओर , उसे सत्य मिलता है |
पृष्ठ - 10 ' दशद्वार से सोपान तक ' Harivansh Rai Bachhan
तो फिर हर अड़ंगे का स्वागत , जो जिंदगी के चौरस रास्ते को ऊबड़ खाबड़ बना देता है , हर ठोकर का स्वागत , जो कहती है , न बैठो , न खड़े रहो , बस आगे बढ़ते चलो । पृ ० 79 .' बसेरे से दूर ' by Harivansh Rai Bachhan ************************************************************************* ' कवियों की होती है बड़ी बदजात , लिखें वे किसी पर , पर करते हैं वे अपनी ही बात । ' पृ ० 85 .' बसेरे से दूर ' by Harivansh Rai Bachhan ******************************************************************************
मैं कितना ही भूलूं , भटकूँ या भरमाऊँ है एक कहीं मंजिल जो मुझे बुलाती है , कितने ही मेरे पांव पड़ें ऊंचे - नीचे प्रतिपल वह मेरे पास चली आती है |
मुझ पर विधि का अहसान बहुत - बातों का पर मैं कृतज्ञ उसका इस पर सबसे ज्यादा -
नभ ओले बरसाये , धरती शोले उगले , अनवरत समय की चक्की चलती जाती है |
Teacher smiled ... advised .... Dear student ! In place of begging marks Why do you not point out my mistake And Say - teacher ! you forgot to give marks in this answer ..... Student was stunned .
फेसबुक ( न्यूज पेपर ) और ट्रांज़िस्टर से ज्ञान प्राप्त करना ज्यादा बेहतर है ।
टी ० वी ० अगर खुल जाय तो बंद करना मुश्किल हो जाता है ।
अपना पसंदीदा कार्यक्रम तो हम कम्प्यूटर के टी ० वी ० पर भी देख सकते हैं ।
शायद यही कारण है आज नेट और कम्प्यूटर के फैलाव का , वैसे रेडियो ( ट्रांज़िस्टर ) तो सदा बहार है । रेडियो हमें खींच कर अपने सामने नहीं बैठाता ,बल्कि यह हमारे साथ साथ किचेन , स्टडी टेबल , लॉन , सड़क इत्यादि जगहों पर चलता रहता है ।
रोटी की कीमत युवा व युवतियों को तब मालूम होती है जब वे घर से दूर नौकरी करने जाते हैं |मेस काखाना कम पैसों में मिलता है पर होटल का खाना तो पूछिये इतना मंहगा कि जेब खाली हो जाय | तब याद आती हैं घर की सूखी रोटियां |
सूखी रोटी आलू के चोखा से हम खायें या पनीर की सब्जी से पेट भर जाता है | रोटी तो केवल दूध के साथ बड़े प्यार से बचपन से खाते हैं बच्चे |
हाय रे ! नौकरी तूने याद दिला दी बचपन की सूखी रोटियां मैं लाख भूलना चाहूं पर अकेले में मुझे सुस्ताते देख चुपके से नजानें क्यों लुढ़कती हुयी आ जातीं हैं जेहन में माँ के हाथ की सूखी रोटियां |